सच्चा मंदिर, sachcha mandir

 


मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां भगवान का वास होता है। और भगवान वही है जिसमें अच्छाई ही अच्छाई हो इसीलिए किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि यदि ' भावना ' अच्छी हो तो मन ही मंदिर बन जाता है। लेकिन भावना अच्छी हो तब। ' सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया' यह भाव सदा सर्वदा मन में बसना चाहिए। 

आहार सही और पवित्र रहे तो तन ही मंदिर है। भाई ! ईश्वर ने कितना सुन्दर शरीर हमें प्रदान किया है, देख लीजिए। लेकिन हमारा आहार कभी कभी जंगली जानवरों से भी बदतर हो जाता है। ऐसा जब होता तो फिर विचार भी वैसा ही हो जाता है। जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन।

विचार, आहार, व्यवहार, भाव सभी अच्छे हो तो जीवन ही मंदिर बन जाता है। जीवन सफल हो जाता है। फिर तो मनुष्य दीनबंधु भगवान बन जाता है।

उषा (कविता) (क्लिक करें और पढ़ें)


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