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स्वयं को जानो

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  स्वयं को जानो: आत्म-खोज की अनंत यात्रा ​इंसान अपनी पूरी जिंदगी बाहर की दुनिया को समझने, दूसरों को परखने और बाहरी सुख-साधनों को हासिल करने में बिता देता है। लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह खुद से ही अनजान रह जाता है। ​तस्वीर की ये पंक्तियां इस सत्य को बेहद सुंदर ढंग से दर्शाती हैं: ​ "जंगल-जंगल ढूँढ रहा है, मृग अपनी कस्तूरी... कितना मुश्किल है तय करना, खुद से खुद की दूरी...!" ​जिस प्रकार कस्तूरी मृग अपनी ही नाभि में मौजूद सुगंधित कस्तूरी की तलाश में पूरे जंगल में भटकता रहता है, ठीक उसी तरह मनुष्य भी शांति, आनंद और ईश्वर को बाहर खोजता फिरता है—जबकि वह सब उसके अपने भीतर ही समाया हुआ है। ​ अहंकार का शोर और आंतरिक शून्य ​हमारा जीवन अक्सर 'मैं' और 'मेरा' के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। मन में विचारों का बवंडर और अहंकार का शोर छाया रहता है: ​ "भीतर शून्य, बाहर शून्य, शून्य चारों ओर है... मैं ही नहीं हूँ मुझमें, फिर भी 'मैं-मैं' का ही शोर है।" ​वास्तव में, जब तक हम अपनी झूठी पहचान और अहंकार ('मैं') को पकड़े रहते हैं, तब तक ह...