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सच्चा मंदिर, sachcha mandir

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  मंदिर वह पवित्र स्थान है जहां भगवान का वास होता है। और भगवान वही है जिसमें अच्छाई ही अच्छाई हो इसीलिए किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है कि यदि ' भावना ' अच्छी हो तो मन ही मंदिर बन जाता है। लेकिन भावना अच्छी हो तब। ' सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया' यह भाव सदा सर्वदा मन में बसना चाहिए।  आहार सही और पवित्र रहे तो तन ही मंदिर है। भाई ! ईश्वर ने कितना सुन्दर शरीर हमें प्रदान किया है, देख लीजिए। लेकिन हमारा आहार कभी कभी जंगली जानवरों से भी बदतर हो जाता है। ऐसा जब होता तो फिर विचार भी वैसा ही हो जाता है। जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। विचार, आहार, व्यवहार, भाव सभी अच्छे हो तो जीवन ही मंदिर बन जाता है। जीवन सफल हो जाता है। फिर तो मनुष्य दीनबंधु भगवान बन जाता है। उषा (कविता)  (क्लिक करें और पढ़ें)

जीवन की सच्ची कमाई jeevan ki sachchi kamai

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  मित्रता एक अनमोल रतन है। सच्चा मित्र वही है जिसमें मित्र की भावना हो। जो मित्र के सुख दुख की परवाह करें। जैसे श्री राम और सुग्रीव की मित्रता, जैसे श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता। परवाह करने वाला मित्र मिल जाए तो जीवन सफल हो जाता है। पड़ोसी वही है जो पड़ोसी का दर्द समझे। रिश्तेदार वहीं सच्चा रिश्तेदार हैं जो अपने रिश्तेदारों  को इज्जत करें। और सही में अंत तक प्यार करने वाला परिवार हो तो जीवन सफल हो जाता है। वर्ना जीवन बोझ बन जाता है। कविता क्या है? कविता कैसे बनती है ?