जीवन का शाश्वत सत्य: जीवात्मा से परमात्मा की यात्रा

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जीवन का शाश्वत सत्य जानें

विचार

​एक बार एक शिष्य ने जिज्ञासा व्यक्त की, मानव जीवन की सबसे बड़ी खोज क्या है? यदि इस प्रश्न का सरल उत्तर खोजें, तो वह है- दुखों से पूर्ण मुक्ति और स्थायी शांति की प्राप्ति। इसी अवस्था को 'परमार्थ' कहा जाता है। अर्थात् वह स्थिति, जहां जीवन के सभी क्लेश समाप्त हो जाएं। इस अवस्था तक पहुंचने की जो प्रक्रिया है, वही साधना कहलाती है।

​हम सामान्यतः अपने आपको एक सीमित अस्तित्व के रूप में देखते हैं- एक ऐसा 'मैं' जो इच्छाओं, भावनाओं और परिस्थितियों से घिरा हुआ है। यही 'मैं' जब तक संसार के सुख-दुख में उलझा रहता है, तब तक उसे अपनी असली पहचान का बोध नहीं हो पाता। इस सीमित चेतना को ही जीवात्मा कहा गया है। इसके विपरीत, जब यही चेतना सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है, तब उसे परमात्मा का स्वरूप माना जाता है।

​अक्सर लोग सोचते हैं कि आत्मा और परमात्मा दो अलग-अलग सत्ता हैं, जिन्हें साधना के माध्यम से मिलाया जाता है, लेकिन गहराई से देखें, तो यह अंतर वास्तविक नहीं, केवल अनुभव का अंतर है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच जो दूरी प्रतीत होती है, उसका कारण केवल संस्कार अर्थात् हमारे पिछले अनुभवों और प्रवृत्तियों का प्रभाव है। जैसे ही ये संस्कार समाप्त होते हैं, वही जीवात्मा अपने मूल स्वरूप अर्थात् परमात्मा में स्थित हो जाती है।

​इस विचार को समझाने के लिए एक सुंदर प्रतीक दिया गया है- एक ही पेड़ पर बैठे दो पक्षियों का। एक पक्षी पेड़ के फलों का स्वाद लेता है, जबकि दूसरा केवल देखता रहता है। यहां फल का आनंद लेने वाला पक्षी जीवात्मा है, जो जीवन के अनुभवों में उलझा हुआ है और जो केवल साक्षी है, वह परमात्मा है- निरपेक्ष, शांत और अचल।

​जीवात्मा प्रकृति के नियमों से बंधी होती है। वह सुख-दुख, जन्म-मरण और कर्मों के चक्र में घूमती रहती है। इसके विपरीत, परमात्मा इन सबका साक्षी और नियंत्रक है। वह माया से परे है, जबकि जीवात्मा माया के प्रभाव में रहती है। साधना का उद्देश्य इसी बंधन को समाप्त करना है, ताकि व्यक्ति अपनी वास्तविक स्वतंत्रता का अनुभव कर सके।

​अब प्रश्न उठता है- सत्य क्या है? हम जो कुछ भी इस संसार में देखते हैं, क्या वह स्थायी है? वास्तव में, संसार की हर वस्तु समय, स्थान और परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है। एक ही वस्तु अलग-अलग परिस्थितियों में अलग रूप में दिखाई देती है। उदाहरण के लिए, जो वस्तु सामान्य व्यक्ति को सफेद दिखती है, वही पीलिया के रोगी को पीली नजर आती है। इससे स्पष्ट है कि हमारी अनुभूतियां भी सापेक्ष हैं।

​इसी प्रकार रीति-रिवाज, परंपराएं और मान्यताएं भी स्थायी सत्य नहीं हैं। वे स्थान और समय के अनुसार बदलती रहती हैं, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं कहा जा सकता। सच्चा सत्य वह है, जो कभी नहीं बदलता। जो समय, स्थान और व्यक्ति से परे है। यही ब्रह्म है, जो शाश्वत और अपरिवर्तनीय है।

​इस सत्य को जानना आसान नहीं है। हमारी इंद्रियां और मन लगातार बाहरी विषयों में उलझे रहते हैं। हम जो देखते, सुनते और महसूस करते हैं, उसी को वास्तविक मान लेते हैं। यही कारण है कि हम उस गहरे सत्य से दूर रह जाते हैं, जो इन सबके पीछे छिपा हुआ है।

​जब कोई साधक अपने मन को विषयों से हटाकर भीतर की ओर केंद्रित करता है, तब धीरे-धीरे उसकी चेतना बदलने लगती है। वह बाहरी आकर्षणों से मुक्त होकर एक ऐसी अवस्था में पहुंचता है, जहां न देखने का आग्रह रहता है, न सुनने का, न अनुभव करने का। यही वह स्थिति है, जहां ब्रह्म का बोध संभव होता है।

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श्री श्री आनंदमूर्ति

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